Saturday, February 16, 2013

पुष्प प्रदर्शनी में निर्भया





हर साल मुंबई में फूलों और सब्जियों की प्रदर्शनी लगती है। इस बार भी यह प्रदर्शनी लगी और ढेर सारे लोगों ने फूलों सब्जियों की इस प्रदर्शनी का आनंद लिया। लेकिन एक कृति के पास आकर हर कोई ठिठक जाता। मैं भी ठिठका। फूलों और काँटों से सजी यह कृति थी दिल्ली गैंगरेप की शिकार निर्भया की जिसे देखते ही जेहन में दिल्ली गैंगरेप की घटना की भयानक तस्वीर उभर आई। बगल में एक इबारत भी थी जो कुछ यूं लिखी थी -


                                                REST IN PEACE NIRBHAYA

 You had been the Victim of the barbaric crime metted by a
 Human on humanity…..

INSPITE OF THAT, You wanted to "LIVE".
                    
                    LIVE ?

WITH US ? The so called humans…
I SALUTE YOU, FOR YOUR COURAGE AND
YOUR UNFAILING TRUST IN US HUMANS
NIRBHAYA….

MAY YOU ATLEAST GET THE LEGAL JUSTICE

    This arrangement is a homage to the victim of Delhi Gang
 Rape 'Nirbhaya/ Damini' name given to her by the INDIAN
 Media.

BLACK VASES CHARACTERIZES THE DARK GLOOMY
INCIDENT
THORNS REPRESENTS HER TORURESOME SUFFERING
TWO FLOWERS WHICH DEPICT NIRBHAYA
CRUSHED FLOWER REPRESENTS HER AGONY
           and

BLOOMING FLOWER DEPICTS HER HOPE TO LIVE AND
FIGHT BACK...



=================
Photo : Satish Pancham
Place : VJTI, MUMBAI
Date  : 16/2/2013
=================
 

Friday, December 7, 2012

परजातंतर




यह फोटो आज सुबह ही ऑफिस जाते वक्त मोबाइल से लिया जिसमें पीछे की दीवार पर वही अलबेली बातें लिखी हैं कि अरबों का घोटाला हुआ, इतने का उतना हुआ और रास्ते के ठीक दूसरे सिरे पर एक शख्स सो रहा है। वहीं दीवार की ओर ही थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो तस्वीर के एक हिस्से में तेज उजाला भी पड़ रहा है जिसमें से किसी नेता का पोस्टर पर बना मुस्कराता चेहरा सड़क पर सोये शख्स को देख रहा है। वस्तुत: यही हो भी रहा है।


Wednesday, August 8, 2012

पिचकी ट्यूब



बचपन में कभी साईकिल की पिचकी ट्यूब को कांधे पर रख हम भी फूले न समाते थे.....उस वक्त सारी कायनात उस पिचकी ट्यूब में समाई लगती थी :)

( ये पिछले साल ली गईं तस्वीरों में से है :)

Friday, July 27, 2012

Random Thoughts

चित्र: सतीश यादव


 हम सभी अपने अपने जीवन के कई-कई खूंटों से बंधे हैं,  कभी कोई खूंटा नौकरी के रूप में है तो कोई खूंटा भार्या के रूप में, कभी पति के रूप में तो कभी बच्चों के रूप में, तो कभी अन्य परिजनों के रूप में हम सभी के जीवन में खूंटा कहीं न कहीं बना ही रहता है और यह जरूरी भी है।
    यहीं देख लिजिए -  पशु और मनुष्य के भेद को यदि थोड़ी देर के लिये भुला दिया जाय तो सोचा जा सकता है कि यदि वह खूंटा न होता तो उसके पास पड़े झौवे में भोजन के लिये रखा चारा भी न होता,  और न ही वह फूस की बनी मड़ैयारूपी आश्रय स्थल होता  जिसमें दिन भर खटने के बाद विश्रांति हेतु खाट बिछी है।
   हां, एक लकड़ी की चौकी भी है जिसे यदि अतिरिक्त सुविधा की बजाय सामाजिक रिश्तों, बैठकों, विचार-विनिमय के ठिये के रूप में देखा जाय तो  खूंटा, खाद्य, आश्रय स्थली, और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी एक मुकम्मल तस्वीर सी उभरती है।
- सतीश 

Sunday, July 8, 2012

चिल्ल मार डीजे....




    पिछले कुछ सालों से शादीयों में मनोरंजन का भार डीजे पर आ गया है, डीजे वालों की चांदी तो होती है लेकिन कभी कभार मुश्किल भी आ खड़ी होती है जब एक पक्ष कहता है कि गाना अश्लील है औ दूजा कहता है चलने दिया जाय...शादी बियाह के टैम कलकान ठीक नहीं....लौंडा लपाड़ी हैं थोड़ा तो चलता ही है........इसी चलता है के आलोक में एक और खेल चल रहा होता है जब डीजे के पीछे पीछे चल रही भीड़ खत्म होने पर चपटी खोली जाती है, कभी देसी कभी विदेशी....हां एक और कहते हैं...महाठंडी बियर जो अक्सर ड्राईवर के जिम्मे होती है कि रखो, मांगें तबइ देना ....औ देखो..चच्चा तक खबर न जाय....लेकिन खबर कैसे न जायगी...चच्चा खुद अपना कोटा वहीं से लेकर निकलते हैं.....और डराईबर एक 'कहंरवा' गाना बजा देता है.....ई डराईबर निमहुरा नरम परेला....हई खलसीया बेटहना गरम परेला....तब क्या चच्चा और क्या बेटहना...झूमकत आवेली बरतीया ऐ तनि देख बलमू हो.....टेहकत आवतीया बरतीया...तनि देख बलमू.... 

 लेकिन बलमू लोगों को देखने का होश रहे तब न.....वे तो मस्त हैं महाठंडी बीयर से  :- )

Friday, July 6, 2012

महिला.... मथनी.... मेटी....मट्ठा



   गाँव-गाँव की  मेरी घुमक्कड़ी के दौरान ली गई एक तस्वीर जिसमें एक महिला मथनी से मेटी में  मट्ठा तैयार कर रही है। जिस वक्त मट्ठा मथा जा रहा था उस समय उसका बेटा बगल में इस उम्मीद से खड़ा था कि मट्ठा मथने से जो उपरी सतह पर 'नैनू' (मक्खन) उतरायेगा तो वह खाने मिलेगा। जबकि उसकी माता इस फेर में थी कि थोड़ा सा चख भर ले, बाकि जो बचे वह उपलों की आग पर रख खर करते हुए घी बनाये....लेकिन बच्चा डटा था कि मुझे और 'नैनू' चाहिये  :-)


समय - माठा 'पियउवल' का

स्थान - ऊपी का  एक गाँव 

Sunday, May 13, 2012



नौटंकी स्टेज के पीछे - 'सिन्गारखोली' ( Changing Room ) का भीतरी दृश्य ....

जिस समय तस्वीर खेंची गई थी उसके थोड़ी देर पहले ही पीली साड़ी पहने लौन्डे ने स्टेज पर पार्ट खेलने के दौरान डाकू के सामने कबीर का दोहा पढ़ा था - कांकर पाथर जोरि के महजिद ली चुनाय....तापर चढ़ि के मुल्ला चिल्लाय का बहरा हुआ खुदाय......