Wednesday, April 4, 2012

देशज दुकनिया




देशज दुकनिया
    जौनपुर के शाही पुल के पास स्थित एक घरेलू लकड़ी के साजो-सामानों से सजी दुकान। आँवले का मुरब्बा बनाते समय आँवले में छेद करने हेतु छेदनी हो या बेलन, अथवा छौंक बघार वाले कलछुल, सभी कुछ ध्यान खेंचते हैं। मूसल जो अब केवल प्रतीकात्मक रूप से ही विवाह के दौरान मंडप में इस्तेमाल होते हैं, वे भी बहुतायत में दिख रहे हैं। उन्हीं सामानों के बीच एक्वाफिना की पानी की बोतल भी रखी है....

और हां, हुक्कों के बगल में शंकर भगवान भी हैं।

- सतीश पंचम 

Friday, February 24, 2012

बीच बजरिया...


   बीच बाजार पैदल चल रहे किशोर के पैरों में चोट लगी है, नंगे पैर खडंजा सड़क पर चल रहा है और उधर उसके हाथ में जो बच्चा है, जिसे बाजार में पैदल नहीं चलना उसके पैरों में झक्क सफेद जूते हैं।

   कई बार जीवन भी इसी विपर्यय की तरह ही सरे बाजार गुजरता हुआ दिखता है। वो विपर्यय जो आवश्यक है, जो एक घनघोर सत्य है।

     कल्पना करें कि हाथ में पकड़ा हुआ बच्चा हम ही  हैं। वह किशोर जो बच्चा हाथ में लिये चोटिल कदमों से नंगे पैर सरे बाजार चल रहा है... हमारे  माता-पिता का ही रूप है। तब ?  ऐसे ही समय हमारी समस्त चेतनायें इस दृश्य को अपने से जोड़ने लगती हैं, अपने बचपन, अपनी जवानी, अपने बुढ़ापे का वह क्रम याद सा हो आता है कि कभी हम भी गोद में थे लेकिन जूते पहनते थे। कभी हमारी भी गोद में कोई बच्चा था लेकिन हम अब भूमिका बदल चोटिल पैरों वाला अभिभावक बन गये हैं और जीवनरूपी बाजार से गुजरते जा रहे हैं....चले जा रहे हैं।

 इस दृश्य को देख मुझसे रहा न गया और गाँव की बाजार में एक दुकान की ओट लेते हुए कैमरा क्लिक कर दिया :)

- सतीश पंचम

Tuesday, February 14, 2012

बाँस बहादुर


बाँस को आधिकारिक तौर पर घास की प्रजाति माना जाता है,  कहीं से घास लग तो नहीं रहा  :)
 Photo : Satish Pancham

Monday, February 13, 2012

'छन' भर भेंट

 'छन' (क्षण)  भर भेंट

कुछ दवाई-दरपन
कुछ हारी-बीमारी
बिटिया की बिदाई
कुछ चूड़ी पहनवाई
कुछ रगरा-झगरा
कुछ मरद के कमाई
तनिक सासु क बुराई
तनिक ननद क लगाई

छन भर क भेंट सखी
अउर केतना बताईं

- सतीश पंचम

Sunday, February 12, 2012

Saturday, September 24, 2011

उठान डगर


उठान डगर 

  मेरे घर के पास स्थित हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ वर्ष पूर्व चित्रकारी की गई थी। उन चित्रों में से कुछ को मैंने अपने कैमरे में कैद कर लिया। पांच-छह साल बाद वहां अब केवल काई लगी दीवार है, झाड़-झंखाड़ है। उन्हीं छायाचित्रों में से एक है यह छायाचित्र जिसमें मानव के विकास, उपर उठने की जिजिविषा दर्शाई गई है कि किस तरह मानव अपने मूल स्थिति से खुद  को उपर विकासक्रम में स्थापित करने हेतु सीढ़ी लाता है, और उपर उठना चाहता है कि तभी उसकी राह रोकने के लिये विषधर भी आ जाते हैं।

- सतीश पंचम 

Saturday, September 17, 2011

भोज्य तक पहुंचने की जद्दोजहद

धर्म, रोजगार, पूंजीवाद,  बहस मुबाहिसों  से घिरे  भोजन  तक पहुंचने की कवायद 
    
  मुंबई के कालाघोड़ा में प्रदर्शित एक कलाकृति....

 - सतीश पंचम